राजस्थान: स्टार प्रचारक नाम के, सिर्फ जातियों के काम के

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राजस्थान: स्टार प्रचारक नाम के, सिर्फ जातियों के काम के

राजस्थान: स्टार प्रचारक नाम के, सिर्फ जातियों के काम के

राजस्थान में 7 दिसंबर को होने वाले मतदान से पहले दोनों पार्टियों यानी बीजेपी और कांग्रेस के अलावा चुनाव लड़ने वाली छोटी पार्टियों और निर्दलीयों ने भी पूरी ताकत झौंक रखी है. बड़ी पार्टियों ने स्थानीय नेताओं के अलावा अपने 40-40 स्टार प्रचारकों को भी मैदान में लगा रखा है. इस बार चुनाव प्रचार के दौरान स्टार प्रचारकों से जुड़ा एक बड़ा ही रोचक पहलू देखने को मिला है.

ये रोचक पहलू है जाति और इलाके के हिसाब से स्टार प्रचारकों की कैटेगरी और रैलियों का निर्धारण. दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों ने अपने स्टार प्रचारकों की रैलियों को उन इलाकों में खास तौर पर करवाया या कहें उन्ही इलाकों में ज्यादा करवाया, जिनमें उनकी जाति की बहुलता है. या फिर उन इलाकों में जहां उन्हे इन स्टार प्रचारकों की जाति के लोगों को लुभाना था.

स्टार प्रचारक अब सिर्फ जातियों पर केंद्रित

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को राजपूत चेहरे के तौर पर बीजेपी ने सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया. पिछले कुछ महीनों से राजपूतों की बीजेपी से नाराजगी की खबरें लगातार मीडिया में थी. हालांकि करणी सेना की जयपुर रैली के बाद ये दावे हवा हो गए थे. क्योंकि बीजेपी को वोट न देने के नाम पर बुलाई गई इस रैली में बमुश्किल 100 लोग पहुंचे थे. जबकि दावा हजारों-लाखों का था. लेकिन कोई रिस्क न लेते हुए बीजेपी ने राजपूतों को मनाने की जिम्मेदारी जैसे राजनाथ सिंह के कंधों पर डाल दी.

राजनाथ की रैलियां जयपुर, शेखावाटी, मेवाड़ और मारवाड़ के राजपूत बहुल इलाकों में रखी गई. दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष और भोजपुरी गायक-अभिनेता मनोज तिवारी की रैलियां खासतौर पर बिहार और पूर्वांचल के लोगों के इलाकों में रखी गई जैसे जयपुर का विश्वकर्मा औद्योगिक क्षेत्र (VKI) या रांकड़ी इलाकेा. हेमा मालिनी को शेखावाटी और मारवाड़ के जाट बाहुल्य इलाकों में ज्यादा दौड़ाया गया. शायद उनके पति धर्मेंद्र को जटसिख समझ कर.

इसी तरह, योगी आदित्यनाथ की रैलियां मारवाड़ में रखी गई क्योंकि जोधपुर के आसपास नाथ संप्रदाय का खासा प्रभाव माना जाता है. उन्हे पूर्व में मेव और पश्चिम में कायमखानी मुस्लिम इलाकों में भी लगाया गया. योगी ने भी अकबर अली और बजरंग बली की तुलना कर ध्रुवीकरण की नीति को सफल बनाने की पूरी कोशिश की. जयपुर के आदर्श नगर में भी उनका भाषण कराया गया. आदर्श नगर सीट पर भी मुसलमानों की अच्छी खासी संख्या है.

यूपी के डिप्टी सीएम केशव मौर्य के लिए जयपुर के आसपास और शेखावाटी के कई कस्बों को चुना गया क्योंकि यहां सैनी वोट डिसाइडिंग फैक्टर हैं. दूसरे डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा को ब्राह्मण बाहुल्य इलाकों में लगाया गया. केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल को बीजेपी अपने एससी चेहरे को तौर पर प्रोजेक्ट कर रही है. उनके हेलीकॉप्टर को अनुसूचित बहुल इलाकों में ज्यादा उतारा गया. पार्टी के लिए राहत रही कि हेलीकॉप्टर देखने भीड़ भी उमड़ी.

कांग्रेस भी किसी से कम नहीं 

कांग्रेस भी स्टार प्रचारकों की रैलियों को लेकर जाति के इसी गणित को भुनाने में लगी रही. सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने जयपुर के विद्याधर नगर में रैली की. यहां मुस्लिमों का बड़ा वोट बैंक है. उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को जयपुर की ही झोटवाड़ा सीट पर लगाया गया. यहां सोडाला इलाके में कुमाऊं के लोगों की अच्छी संख्या है.

हाल में सबसे ज्यादा चर्चा में रहे पंजाब के पर्यटन मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाबी बहुल इलाकों में घुमाया गया. मालवीय नगर, आदर्श नगर और किशनपोल जैसे इलाकों में सिद्धू ने बयानों के तीर छोड़े. पंजाब सीमा से सटे श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जैसे इलाकों में पंजाब के दूसरे नेताओं को लगाया गया. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे और रोहतक सांसद दीपेंद्र हुड्डा के जरिए जयपुर के पास सांगानेर इलाके के जाटों को साधने की कोशिश की गई.

जयपुर के सिविल लाइंस और मालवीय नगर जैसी विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने ग्लैमर का तड़का भी खूब लगाया. यहां अभिनेत्री अमीषा पटेल को ओपन जीप में घुमाया गया. उन्हे देखने के लिए लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचे. अब ये देखने वाली बात होगी कि क्या उनका चेहरा इन लोगों के वोट भी दिला पाता है या नहीं.

बड़े नेताओं की डायरी में भी जातीय इलाके

बीजेपी से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, कांग्रेस से अशोक गहलोत और सचिन पायलट ऐसे नेता हैं जिनकी पूरी राज्य में डिमांड है. ये जातीय गणित की रणनीति से ऊपर हैं. लेकिन इनकी रैलियों का एक बड़ा हिस्सा भी जाति की गणित से अछूता नहीं रहा है. गहलोत की रैलियां उन सीटों पर खास तौर पर रखी गई हैं जहां सैनी वोटर ‘वोलेटाइल’ हैं  जैसे कोटपूतली, आमेर, सांगानेर या सीकर और झुंझुनूं की सीटें. इसी तरह से सचिन पायलट पूर्वी राजस्थान के गुर्जर बाहुल्य इलाकों पर खास तौर पर फोकस कर रहे हैं.

तीसरी ताकत के तौर पर इस बार हनुमान बेनीवाल ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी बनाकर खम ठोंका है. यूं तो बेनीवाल ने लगभग पूरे राजस्थान में अपने उम्मीदवार उतारे हैं. लेकिन उनका फोकस भी जाट बहुल इलाकों पर ही ज्यादा है. नागौर के आसपास और मारवाड़-शेखावाटी में वे सबसे ज्यादा समय दे रहे हैं. भरतपुर में पूर्व मंत्री शशि दत्ता उनकी पार्टी से उम्मीदवार हैं लेकिन जब वे सभा करने पहुंचे तो भीड़ न देखकर दोबारा वहां न आने की घोषणा भी मंच से ही कर डाली.

दूसरी ओर, कांग्रेस में पहले बड़े पदों पर रहे ऐसे नेता भी हैं, जिनका उनकी जाति में गहरा दबदबा है, लेकिन टिकट कटने से या तो वे खुद प्रचार से दूर हैं या फिर उन्हे पूछा नहीं जा रहा. इन नेताओं में जयपुर से ही 2 बड़े नाम गिनाए जाते हैं मसलन, कद्दावर नेता नवल किशोर शर्मा के बेटे और पूर्व शिक्षा मंत्री ब्रज किशोर शर्मा या फिर पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल. शर्मा कुछ दिन से अस्पताल में भर्ती हैं तो खंडेलवाल घर से बाहर नहीं निकल रही हैं.

आमतौर पर स्टार प्रचारक लिस्ट में उनको रखा जाता है जिनका प्रभाव सभी इलाकों या सभी जातियों पर हो. या फिर इन्हे देखने-सुनने की जनता में उत्सुकता हो. लेकिन ऐसा कम ही देखने को मिलता है जब स्टार प्रचारकों को उनकी जाति के इलाकों तक ही सीमित कर दिया जाए. हो सकता है कि अपने कोर वोटर के खिसकने के खतरे के बीच थामे रखने की चुनौती की वजह से शायद ये बदलाव किया गया हो. वैसे भी कहा जाता है कि राजनीति में कोई नीति स्थायी नहीं होती. बहरहाल, इस नई नीति की सफलता तो 11 दिसंबर को ही सामने आ सकेगी.

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