बहुत मुश्किल होती है महिला नागा साधु की जिंदगी,अकेले सैंकडों साधुओं के साथ काटनी पड़ती हैं राते

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बहुत मुश्किल होती है महिला नागा साधु की जिंदगी,अकेले सैंकडों साधुओं के साथ काटनी पड़ती हैं राते

बहुत मुश्किल होती है महिला नागा साधु की जिंदगी,अकेले सैंकडों साधुओं के साथ काटनी पड़ती हैं राते

NEW DELHI: नागा साधु का नाम सुनते ही मन में एक छवि बनती है…लंबी- लंबी जटाएं.. तन भस्म से लिपटा हुआ। चाहे कोई भी मौसम हो नागा साधु शरीर पर कपड़ों के नाम पर केवल लंगोट पहनते हैं। यही कारण है कि लोग उनको नागा साधु भी कहते हैं। ये साधु सालों साल आखाड़ों में ही रहते हैं और सिर्फ कुंभ के वक्त ही दिखाई देते हैं। 12 साल की कठिन तपस्या के बाद ही एक आम इंसान नागा साधु बन पाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महिलाएं भी नागा साधु बन सकती हैं।
नागा साधु की दीक्षा देने से पहले उसके स्वयं पर नियंत्रण की स्थिति को परखा जाता है। तीन साल तक दैहिक ब्रह्मचर्य के साथ मानसिक नियंत्रण को परखने के बाद ही नागा साधु की दीक्षा दी जाती है। दीक्षा लेने से पहले ख़ुद का पिंड दान और श्राद्ध तर्पण करना पड़ता है। हिंदू धर्म में पिंडदान व श्राद्ध मरने के बाद किया जाता है। इसका मतलब हुआ सांसारिक सुख दुःख से हमेशा के लिए मुक्ति। पिंड दान और श्राद्ध के बाद गुरु जो नया नाम और पहचान देता है, उसी नाम के साथ इन्हें ज़िंदगी भर जीना होता है।
महिला नागा संन्यासन बनने से पहले अखाड़े के साधु-संत उस महिला के घर परिवार और उसके पिछले जन्म की जांच पड़ताल करते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि नागा साधु बनने से पहले महिला को खुद को जीवित रहते हुए अपना पिंडदान करना पड़ता है और अपना मुंडन कराना होता है, फिर उस महिला को नदी में स्नान के लिए भेजा जाता है। इसके बाद महिला नागा संन्यासन पूरा दिन भगवान का जाप करती है और सुबह ब्रह्ममुहुर्त में उठ कर शिवजी का जाप करती है। शाम को दत्तात्रेय भगवान की पूजा करती हैं। सिंहस्थ और कुम्भ में नागा साधुओं के साथ ही महिला संन्यासिन भी शाही स्नान करती हैं। दोपहर में भोजन करने के बाद फिरसे शिवजी का जाप करती हैं और शाम को शयन करती हैं। इसके बाद महिला संन्यासन को आखाड़े में पूरा सम्मान दिया जाता है। पूरी संतुष्टी के बाद आचार्य महिला को दीक्षा देते हैं।
इतना ही नहीं उन्हें नागा साधुओं के साथ भी रहना पड़ता है। हालांकि महिला साधुओं या संन्यासन पर इस तरह की पाबंदी नहीं है। वह अपने शरीर पर पीला वस्त्र धारण कर सकती हैं। जब कोई महिला इन सब परीक्षा को पास कर लेती है तो उन्हें माता की उपाधि दे दी जाती है और अखाड़े के सभी छोटे-बड़े साधु-संत उस महिला को माता कहकर बुलाते हैं। पुरुष नागा साधु और महिला नागा साधु में केवल इतना फर्क है कि महिला साधु को पीला वस्त्र लपेटकर रखना पड़ता है और यही वस्त्र पहनकर स्नान करना पड़ता हैं। महिला नागा साधुओं को न,ग्न स्नान की अनुमति नहीं हैं। कुंभ मेले में भी नहीं।

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