मोदी को भारी पड़ सकती है आखिरी वक्त में मुसलमानों से हमदर्दी दिखाने की कोशिश

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मोदी को भारी पड़ सकती है आखिरी वक्त में मुसलमानों से हमदर्दी दिखाने की कोशिश

मोदी को भारी पड़ सकती है आखिरी वक्त में मुसलमानों से हमदर्दी दिखाने की कोशिश

जैसे-जैसे मोदी सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने की दिशा में बढ़ रही है, मुस्लिम समुदाय के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का झुकाव भी बढ़ता जा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी लगातार मुस्लिम समुदाय के बीच व्यक्तिगत तौर पर अपनी, अपनी सरकार और बीजेपी तीनों की छवि सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. इसी कड़ी में मोदी ने मध्य प्रदेश के इंदौर में बोहरा समाज के 53वें धर्मगुरु के वाअज़ (प्रवचन) में शामिल होकर यह संदेश देने की कोशिश की उन्हें न तो मुस्लिम समुदाय से कोई बैर है और न ही वो उसे नज़र अंदाज़ करते हैं.दाऊदी बोहरा समाज के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब उसके वाअज़ में कोई प्रधानमंत्री शामिल हुआ. मोदी विदेशों में तो 6 बार मस्जिदों में गए हैं लेकिन देश में किसी मस्जिद मे जाने का उनका यह तीसरा मौका है. विदेशों के मस्जिदों में जाने और देश में इससे बचने को लेकर कई तरह के सवाल भी उठे थे. आज मोदी ने यह शिकायत दूर करने की कोशिश की है. बोहरा समुदाय की सैफी मस्जिद में वो करीब आधे घंटे रुके और उनके भाषण के लिए वाअज़ रोका गया. देश मे तीन साल बाद दाऊदी बोहरा समाज के 53वें धर्मगुरु सैयदना आलीक़दर मुफ़द्दल सैफ़ुद्दीन मौला का सैफी नगर मस्जिद में 9 दिनी वाअज़ चल रहा हैं.दाऊदी बोहरा समाज की इस मजलिस में प्रधानमंत्री ने इस समुदाय की जमकर तारीफ की. पीएम ने कहा कि यह समाज कोशिश कर रहा है कि कोई भी व्यक्ति भूखा ना सोए. लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सेवाए देने के लिए दर्जनों अस्पताल चला रहा है. देश में पहली बार सरकार ने भी स्वास्थ्य को इतनी अहमियत दी है. गुजरात सरकार के दौरान आप लोगों ने मेरा साथ दिया. बोहरा समाज शांति का संदेश देता है. कुछ साल पहले कुपोषण से लड़ने के लिए गुजरात सरकार के दौरान मैंने सहयोग मांगा था जिसे उन्होंने हाथों हाथ लिया और मेरा सहयोग किया.आज भी मेरे दरवाजे आपके परिवारजनों के लिए खुेल रहते हैंपीएम मोदी ने कहा, महात्मा गांधी और सैयदना की मुलाकात ट्रेन में हुई और दोनों के बीच निरंतर संवाद होता रहा. दांडी यात्रा के दौरान महात्मा गांधी सैयदना साहब के घर सैफी विला में ठहरे थे. आजादी के बाद सैयदना साहब ने इस विला को देश को समर्पित कर दिया था. यहां मुझे अपनापन महसूस होता है. आज भी मेरे दरवाजे आपके परिवारजनों के लिए हमेशा खुले रहते हैं. पीएम मोदी ने इमान हुसैन को याद किया. उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने अमन और शांति के लिए शहीद हुए थे. शांति, सद्भाव, सत्याग्रह और राष्ट्रभक्ति के प्रति बोहरा समाज की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है. अपने देश से अपनी मातृभूमि के प्रति सीख अपने प्रवचनों से देते रहे हैं.दरअसल प्रधानमंत्री ने दाऊदी बोहरा समुदाय के मंच से देश के सभी मुसलमानों को संदेश देने की कोशिश की है. संदेश यह कि अगर देश का मुस्लिम समुदाय बोहरा समुदाय की तरह सामाजिक कामों पर जोर दे तो इससे समाज और देश दोनों मज़बूत होगे. दाऊदी बोहरा समुदाय एक छोटा लेकिन आर्थिक रूप से बेहद संपन्न समुदाय है. इनकी करीब 20-30 लाख की आबादी गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रेदश के तीन ज़िलों उज्जैन, इंदौर और बुरहानपुर तक फैली है. गुजरात और मध्यप्रदेंश में इस समुदाय का का खासा राजनीति प्रभाव है. देश भर में शिया मुसलमानों का बीजेपी के साथ अच्छा तालमेल है लिहाज़ा यह समुदाय भी गुजरात और मध्य प्रदेश में बीजेपी के ही नज़दीक है.यह भी पढ़ें- बोहरा समुदाय के बीच PM मोदी: सामाजिक समीकरण की गांठें कसने की सियासतप्रधानमंत्री मोदी ने दाऊदी बोहरा समाज के इस मंच का इस्तेमाल अक्सर बीजेपी से नाराज़ रहने वाले मुस्लिम समुदाय तक अपनी बात और अपनी सरकार के कामकाज पहुंचाने के लिए किया है. इस मंच से मोदी ने 2022 में सबको मकान मुहैया कराने के अपनी सरकार के लक्ष्य से लेकर आम आदमी को सस्ती स्वस्थय सेवाएं मुहैया कराने वाली आयुष्मान भारत योजना तक का ज़िक्र करके यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनकी सरकार बगैर धार्मिक भेदभाव के सबके विकास के लिए काम कर रही है. लिहाज़ा मुस्लिम समुदाय को भी सरकारी योजनाओं का बढ़-चढ़ कर लाभ उठाना चाहिए. ऐसा कहकर मोदी ने मुस्लिम समाज के बीच अपनी और अपनी सरकार की छवि सुधारने की कोशिश की है.2015 से ही कट्टर हिंदुत्व की छवि तोड़ने की शुरुआत कर चुके हैं मोदीहालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने मस्जिदों में जाकर अपनी कट्टर हिंदुत्व वाली छवि तोड़ने की शुरुआत 2015 में ही शुरू कर दी थी. प्रधानमंत्री देश-विदेशों की कई मस्जिदों में जा चुके हैं. दुबई, ओमान और इस साल इंडोनेशिया व सिंगापुर दौरे पर पीएम कई प्रसिद्ध मस्जिदों में गए, सिंगापुर की चुलिया मस्जिद में उन्हें हरे रंग की चादर भेंट की थी, जिसे पीएम ने स्वीकार भी किया था. पीएम इंडोनेशिया के जकार्ता स्थित इस्तिकलाल मस्जिद भी गए थे. भारत मे पिछले साल पीएम जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ गुजरात में सिदी सईदी मस्जिद में गए थे. इससे पहले वो भारत में बनी पहली मस्जिद केरल की मशहूर जामा मस्जिद में भी जा चुके हैं.2011 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते सामाजिक सदभावना के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में मोदी ने मुस्लिमों को हाथों टोपी पहनने से इनकार कर दिया था. इससे उनकी धुर मुस्लिम विरोधी और कट्टर हिंदू वाली छवि बनी थी. आज तक मोदी के इस कदम की आलोचना होती है. प्रधामनंत्री बनने के बाद मोदी ने धीरे-धीरे अपनी छवि सुधारी है. अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में मोदी ने कई मुस्लिम नौजवानों के देश और समाज क लिए किए गए उनके काम को सराहा और उन्हें सम्मान दिलाया. गरीबों के लिए फ्री गैस सिलेंडर देने वाली ‘उज्जवला योजना’ के पोस्टर पर अपने साथ एक मुस्लिम महिला की फोटो लगवा कर यह संदेश देने की कोशिश की कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ के उनके एजेंडें मे मुसलमान भी शामिल है.यह भी पढ़ें- मुस्लिम परस्त पार्टी की छवि से निजात पाने को छटपटा रही है कांग्रेसपीएम मोदी सबसे ज्यादा मुस्लिम देशों का दौरा करने वाले प्रधानमंत्री बन गए है. 2016 में सऊदी अरब के दौरे पर उन्हें वहां की सरकार ने अपना सबसे बड़ा नागरिक सम्मान दिया था. उसके बाद देश मे कई मुस्लिम संगठनों ने पीएम को अपने मंच पर बुलाया. 2014 में जहां मोदी के नाम पर मुस्लिम संगठन नाक भौं सिकोड़ने लगते थे वहीं अब उन्हें अपना मेहमान बनाने या फिर उनका मेहमान बनने के लालायित रहते है. दाऊदी बोहरा समुदाय के कार्क्रम में मोदी का जाना जहां मध्य प्रदेश में बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है वहीं 2019 में मुस्लमानों की बीजेपी से लगातार बनी दूरी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.मुस्लिम और बीजेपी के बीच नफरत का रिश्ता दोनों के लिए नुकसानदेहप्रधानमंत्री के तौर पर मुसलमानों के साथ संवाद स्थापित करने की मोदी के इस क़दम की ताऱीफ होनी चाहिए. बल्कि मुस्लिम समुदाय की तरफ से इस पहल का स्वागत होना चाहिए. मुस्लिमों के अन्य संगठनों को भी पीएम मोदी को अपने मंच पर बुलाकर संवाद की इस परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए. लोकतंत्र में मतभेद होते हैं, कभी-कभी मनभेद भी हो जाते हैं. लेकिन इन्हें दूर करने की कोशिशे होती रहनी चाहिए. दोनों के बीच एक पुल बनाने की कोशिश हमेशा होनी चाहिए.मुस्लिम समुदाय और सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के बीच लगातार नफरत का रिश्ता दोनों के लिए ही नुकसानदेह है. इससे देश को फायदा होने वाला नहीं है. मुसलमानों से जुड़े जिन मुद्दों पर पीएम की चुप्पी अखरती है उन मुद्दों पर पीएम का मुंह खुलवाने का यह बेहतर तरीका हो सकता है कि मुस्लिम संगठन पीएम के साथ सार्वजनिक मंचों पर परस्पर संवाद बढ़ाएं.यह भी पढ़ें- रास्ता रोककर नमाज़ पढ़ना इबादत नहीं ढकोसला हैअगर चुनावों के मद्देनज़र पीएम मोदी मुस्लिम समाज में अपनी छवि सुधार कर इसका राजनीति फायदा उठाना चाहते हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं है. हर पार्टी को अपना जनाधार बढ़ाने का अधिकार है. मुसलमानों को लेकर बीजेपी की नीति बहुत साफ है. वो मुस्लिम समुदाय के कुछ फिरकों को साथ लेकर आगे बढ़ती है और कुछ को एकदम नज़र अंदाज़ करती है. केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद बीजेपी के कई बड़े नेता साफ तौर पर कह भी चुके हैं कि बीजेपी को हिंदुओं को एकजुट करने और मुस्लिम वोटबैंक को तितर-बितर करने की नीति पर काम करना चाहिए. इसीलिए पीएम मोदी कभी सूफी मुसलमानों के साथ नज़र आते हैं तो कभी शिया मुसलमानों के साथ.पीएम मोदी का दांव उल्टा न पड़ जाए!इस राजनीतक पैंतरेबाज़ी से बीजेपी के कोई खास फायदा होने वाला नहीं है. उल्टे यह बीजेपी के लिए एक बार फिर भारी पड़ सकता है. 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी ने भी मुसलमानों के बीच ऐसे ही अपनी छवि सुधारने की कोशिश की थी. उनके समर्थन में तब कई धार्मिक मुस्लिम संगठनों ने मिलकर अटल बिहारी वाजपेयी हिमायत कमेटी बनाकर मुस्लिम समुदाय से उन्हें फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट देने की अपील की थी. मुस्लिम समुदाय पर इसका कोई असर नहीं हुआ और वाजपेयी सत्ता से हाथ धो बैठे थे. मुसलमान अभी बीजेपी पर भरोसा करने को तैयार नहीं है. वहीं बीजेपी का कोर वोटर और संघ परिवार को मुसलमानों के साथ प्रधानमंत्री या फिर बीजेपी के आला नेतृत्व की गलबहियां पसंद नहीं आतीं. डर यह है कि कहीं वाजपेयी जैसा हश्र मोदी का न हो जाए.बक़ौल मोमिन,‘कटी तमाम उम्र इश्क़-ए-बुतां में मोमिन,
आख़री वक़्त क्या ख़ाक मुसलमां होंगे.’(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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